उसके पिता को राघव की चिट्ठी

उसके पिता के नाम चिट्ठी, Letter, Letter To her Father, Hindi Letter

 


"नमस्कार, रामसेवक जी ।" 


"नमस्कार, माधो जी ।" नमस्कार करने के साथ ही माधो जी ने एक चिठ्ठी राम सेवक जी के हाथ में थमा दी । 


"ये देख कर अच्छा लगा कि आज के समय में भी लोग चिट्ठियां भेजते हैं ।" माधो जी ये कह कर चले गए । इधर रामसेवक जी चिट्ठी को उलट पलट कर देखते हुए सोचने लगे कि आज के समय में चिट्ठी कौन लिखता है ? और उन्हें चिट्ठी भेजने वाला ये शुभचिंतक कौन है । 


अपनी दुविधा दूर करने के लिए उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला और चिट्ठी पढ़ने लगे । 


प्रणाम सर


मुझे पता है आपको जैसे ही पता लगेगा ये मेरी चिट्ठी है वैसे ही आप पढ़ना बंद कर देंगे । आप अपना फैसला सुना चुके हैं लेकिन यकीन मानिए मैंने आपका फैसला बदलने की कोशिश करने के लिए ये चिट्ठी नहीं लिखी । मुझे तो आपको बस आपसे कुछ बातें कहनी हैं । बहुत हिम्मत जुटा के ये चिट्ठी लिखी है, एक बार पढ़ लीजिए । वैसे भी खुद को हरा कर आपको जिताया है, इसके बदले चंद मिनट तो आप दे ही सकते हैं ।" 


9 साल से आपके बारे में सुन रहा हूं सर । पापा ऐसे हैं पापा वैसे हैं, अपने बच्चों के लिए वो बहुत सोचते हैं, बहुत प्यार करते हैं । उसकी ये सब बातें सुन कर लगता था कि मुझे आपकी तरह ही बनना चाहिए । उसने मुझमें, मेरी हर अच्छी बात, अच्छी आदत में आपको खोजा है । सर, अगर कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की तुलना अपनी मां से और कोई प्रेमिका अपने प्रेमी की तुलना अपने पिता से कर दे तो समझ लीजिए उनका प्रेम एक अलग ही स्तर को छू चुका है । 


वो भी ऐसी ही है । उसने हर बार मेरी तुलना आपसे की है लेकिन सर उस दिन मैंने उसकी नज़रों में आपके सम्मान को गिरते देखा । आपने हमें एक होने से रोका इस बात का मलाल नहीं था हमें । आप बेटी के पिता हैं बहुत कुछ सोचना पड़ता होगा आपको लेकिन आपकी कुछ बातों ने उसे तोड़ दिया । 


ये बहुत अच्छी बात है कि इस समाज में आपका बेहद सम्मान है । आप लोगों के लिए एक मिसाल की तरह हैं । लेकिन आपका यही सम्मान आज हमारे लिए काल बन गया है । खैर इसका भी मलाल नहीं । मलाल है तो सिर्फ़ एक बात का कि आपने समाज में अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान कम ना होने दिया भले ही आपकी बेटी की आत्मा घुट के मर गई । आपने उससे कहा कि आप अपने सम्मान के लिए उसे गड्ढे में भी धकेल सकते हैं । 


सर कम से कम मैं ऐसा शख्स तो नहीं बनना चाहूंगा जो बाहर का सम्मान बचाने के लिए अपनों की नज़र में गिर जाए । ऐसे समाज, प्रतिष्ठा और सम्मान का क्या ही मतलब जिसे बचाने के नाम पर आप अपनों के अरमानों की बलि दे दें । 


आप हत्यारे होते हैं जब अपनी झूठी शान के लिए किसी की आत्मा की हत्या कर देते हैं । 


सर, मैं तो कहता हूं संविधान में इस तरह की हत्या के लिए भी दंड का प्रावधान होना चाहिए जहां मरने वाले का तन नहीं बल्कि उसका मन और आत्मा मरती है । बिना चीखों की ये हत्या करना शरीर की हत्या करने से बड़ा अपराध है । 


सच में प्रतिष्ठित लोग बहुत बड़े हत्यारे हैं । ऐसी प्रतिष्ठा को मैं खुद से बहुत दूर रखना चाहता हूं जिसके लिए मुझे मेरे अपनों की आत्मा मारनी पड़े, उनकी खुशियों का सौदा करना पड़े । 


आपको एक बार सोचना चाहिए था कि जिस बेटी ने कभी आपके सामने कोई ऐसी वैसी बात नहीं कही उसने एक लड़के के लिए आपको अपने दिल की बातने की हिम्मत कैसे जुटाई होगी । आपको समझना चाहिए था कि उसके लिए, उसके कल के लिए मैं कितना ज़रूरी हूं जो उसने इतनी हिम्मत कर ली । 


हम चाहते तो कब का अपने मन की कर चुके होते लेकिन सिर्फ़ आपके लिए ये कदम नहीं उठाया । क्योंकि पिता की अहमियत जानता हूं मैं और एक पिता के टूटे अभिमान पर अपनी खुशियों का महल नहीं खड़ा करना चाहा कभी । बाकी आपको आपकी वो जीत मुबारक हो जिसके लिए हम दोनों अपनी ज़िंदगी हार गए । 


अब वो आपकी ज़िम्मेदारी है । उसका अच्छे से ख्याल रखिएगा । उसको अगर कुछ हुआ तो मैं आपको कभी माफ नहीं कर पाउंगा । 


अंदर से टूट रहा हूं और टूट रहे इंसान की बातें बहुत चुभती हैं । अगर कुछ बुरा लगा हो तो बेटा समझ कर माफ कर दीजिएगा । वैसे भी हम जिस समाज में हैं वहां बेटियों का सही कदम भी भले बर्दाश्त ना करें मगर बेटों की गलतियां तो माफ हो ही जाती हैं । 


ईश्वर आपको जल्दी आपकी गलती का अहसास कराए । 


प्रणाम 


राघव 


चिट्ठी में पूरी तरह से खो चुके थे रामसेवक जी । चिट्ठी खत्म होने के बाद भी निगाहें वहीं जमीं हुई थीं । तभी किसी की आवाज़ कानों में पड़ी । 


"नमस्कार, रामसेवक बाबू ।" रामसेवक जी ने बड़ी मुश्किल से अपने बिखर रहे घमंड को संभाला । 


"नमस्कार देव जी । कैसे हैं ।" 


"बस ठीक हैं साहब । आपको धन्यवाद कहने आए थे ।" 


"किस बात के लिए जी ?" 


"आपने उस दिन समझाया ना होता तो शायद आज हम अपना बेटा खो चुके होते । सच में समाज को आप जैसे लोगों की ज़रूरत है जो लोगों की सोच को बदल सके ।" रामसेवक जी कुछ बोल नहीं पाए । उनके दिमाग में अभी भी वो चिट्ठी ही घूम रही थी । मनों बार बार उनके इस खोखले सम्मान पर वार कर रही हो । 


"हं सोचते रहे कि बेटा का दूसरा कास्ट में शादी कर के समाज में नाक कट जाएगा । इसी बात के लिए उसकी खुशियों को मारने चले थे मगर आपने जब समझाया तब समझे कि बेटे की खुशी सबसे बड़ी है । समाज का क्या है, आप जैसे चलेंगे वैसे आपके पीछे चलने लगेगा । आप सच में बहुत बड़ी समस्या का हल दे दिए हमें ।" देव जी काफ़ी समय तक रामसेवक जी का गुणगान करते रहे और फिर मिठाई का डिब्बा थमा कर वहां से चले गए । 


रामसेवक जी काउंटर पर पड़े मिठाई के डब्बे और राघव की चिट्ठी को एक साथ देखते रहे । एक उनका सम्मान था और दूसरा उनका काला सच । 


धीरज झा 

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Qisson Ka Kona | Kisson Ka Kona: उसके पिता को राघव की चिट्ठी
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